Sunday, 3 July 2011

उ बोड़ा कु खल्याँण .....!

गौं का छोरों कू
छोट्टा बड़ों कू
दाना सयाणों कू
रोज व्यखानी धां
बस एक ही छा काम
बोड़ा का ख्ल्याण मा सबुन ही जाण |

रूड्यों का दिनु मा
चा ठंडी हवा खाण
या ह्युंद का दिनु मा
घाम तापण
बोड़ा का ख्ल्याण मा सबुन ही जाण |

कोणा पक़ड़यां छा
सबु का अपरा
होड़ मचीं छा
अपरी जगा खुजाण
बोड़ा का ख्ल्याण मा सबुन ही जाण |

बुड्यों की लगणी छा
गोरु, भैंसों की सैदा
बुड्डी व्हेगें सुरु
सासु ब्वारियों की कथा सुनाण
बोड़ा का ख्ल्याण मा सबुन ही जाण |

नोन्यों की थूचा
अर छोरों की गुच्छी
थौल जुड्यूं छा
बोड़ा का ख्ल्याण
बोड़ा का ख्ल्याण मा सबुन ही जाण |

रचनाकार : धर्म सिंह कठैत (अजनबी)
ग्राम छडियारा
खास पट्टी टिहरी गढ़वाल
(सर्वाधिकार सुरक्षित 03/7/2011)

3 comments:

  1. Replies
    1. बहुत सुन्दर सृजन, आभार.

      मेरे ब्लॉग " meri kavitayen" की नवीनतम प्रविष्टि पर आप सादर आमंत्रित हैं.

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