दुनिया आगे निकल गई है या हम पीछे छूट गए है लेकिन हम जहाँ है जीवन की असुविधाएं तो हैं पर अपार आनंद भी है
कभी कभी मनसोचता है की हम पीछे नहीं छूटे दुनियां भटक गयी है मृग तृष्णा में .... या कुछ और ......
माँ के हाथ की चूले में बनायीं वो मंडूये की रोटी का स्वाद आज भी मुह में बरकरार है ताज़ी खाओ तो किसी पॉँच सितारा होटल की महँगी से महँगी मुफ्फिन से कम नहीं और रात भर टोकरे (ठोफरे) में सूख के सुबह चाय के साथ खाओ तो किसी चोकोलेट बिस्कुट से कम नहीं ....

हां ये बात बताना तो भूल ही गया है हम लोग गर्मियों में सुबह नास्ता और दिन में लंच करते हैं किन्तु सर्दियों में बिलकुल अलग ही रिवाज है सुबह उठते ही खाना बनना सुरु हो जाता है.. दाल - भात ,सब्जी पूरा खाना खा के ही लोग घरों से काम के लिए निकलते हैं सर्दियों में दिन में धूप कम होती है तो खेत में काम ३-४ बजे तक आराम से कर सकते है और फिर दोपहर में चाय के साथ नास्ता होता है ...... मजेदार . कभी आलू और अरबी के छोले तो कभी चटनी के साथ मंडूये की रोटी .....क्या स्वाद कभी ना भूलने वाला ..
उम्दा पोस्ट-बेहतरीन लेखन के बधाई
आपकी पोस्ट चर्चा ब्लाग4वार्ता पर-पधारें
आनन्द आ गया..क्या क्या न याद आया,
ReplyDeleteश्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये
आपकी पोस्ट ने तो व्रत के दिन भी जी ललचा दिया :)
ReplyDeleteआपको सपरिवार श्री कृष्णा जन्माष्टमी की शुभकामना ..!!
बड़ा नटखट है रे .........रानीविशाल
जय श्री कृष्णा
वाह ....कभी मिले खाने का मौका ...
ReplyDeleteजन्माष्टमी की शुभकामनाएं
वाह आपकी पोस्ट पढकर तो मुंह में पानी आरहा है. जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.
ReplyDeleteरामराम.
भाई मंडुये की रोटी कैसे बनती है? और ये मंडुआ होता क्या है? कृपया बताये तो मेहरवानी होगी.
ReplyDeleteरामराम.
किसी वक्त मडुवे कि रोटी पहाड़ में आम लोगों का मुख्य आहार थी पर अब इसका प्रचलन कम हो गया है. अभी कुछ दिनों पहले ही मैं अपने गाँव गया था. वहा मैंने मडुवे कि रोटी खानी चाही पर अफ़सोस कहीं भी मडुवे का आटा नहीं मिल पाया. मडुवा एक बेहद पोस्टिक आहार है पर शायद इसकी खेती कम कर दी गयी है. धर्म सिंह जी लेख बढ़िया है और चित्र बहुत सुन्दर. मडुवे का स्वाद याद आ गया. धन्यवाद.
ReplyDeleteगढ़वाली जीवन पर आधारित आपका ये ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा!!! लेख पढ़कर बहुत आनंद आया!! ऐसे ब्लॉग, ब्लॉगिंग के नए रूप को सामने लाते हैं और वेशभूषा, खानपान, जीवन शैली के बारे में जो जानकारी प्रदान करते हैं वो अमूल्य होती हैं!! मैं आशा करूँगा कि आप गढ़वाल पर अधिक से अधिक लिखेंगे
ReplyDeleteवाह जी
ReplyDeleteरोटी देखकर ही मन ललचा गया मदुये का आटा कैसा तैयार होता है ?
मुझे तो अलग अलग अनाज की रोटी खाना अच्छा लगता है |
बहुत सुन्दर चित्रों के साथ वर्णन |
पहाड़ी और ग्रामीण जीवन के बारे में जानना अच्छा लगता है |
वह्ह्ह्
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